क्या ध्यान करने से हो सकती है परमात्मा की प्राप्ति ?

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जिस तरह भजन करने से पापों का नाश होता है , उसी तरह उपवास करने से भी पापों का नाश हो जाता है । भोजन के पूर्व और स्नान के बाद का समय भगवान के भजन , ध्यान के लिये अच्छा है । भोजन के बाद स्वाध्याय करना अच्छा है सोने से इन्द्रियों को आराम मिलता है । ध्यान के समय भी इन्द्रियों को आराम मिलता है । अतएव सोने के समय में कमी करके उस समय को भी भगवान के ध्यान में लगाये तो वह निद्रा की पूर्ति कर देगा ।

एक रहस्य की बात बतायी जाती है । भाव का सम्बन्ध है । जैसे माता , बहन रसोई बनाती हैं और साधु , महात्मा , दुःखी को भोजन देती हैं , यह उत्तम काम है , किंतु बहुत जल्दी लाभ नहीं दिखता । इसका क्या कारण है ? बात यह है कि इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि सबमें समभाव रखे । रसोई बनाये तो एक - सी बनाये । दो तरह की नहीं बनाये । अपने लिये बढ़िया और दूसरे के लिये घटिया यह विषमता विष है । यह विषमता पाप है । उससे लाभ बहुत कम होता है । हम पैसा खर्च तो करते हैं , उससे मोक्ष मिलने के बजाय स्वर्ग मिलकर ही रह जाता है । अतएव भेदभाव न करे , एक - सी रसोई बनाये । भेदभाव हो तो प्रायः भगवान् नहीं मिलते । 

समता गुण है । समता से बढ़कर गुण विषमता है जो जल्दी भगवान की प्राप्ति करा देती है । वह विषमता क्या है ? बढ़िया - बढ़िया तो दूसरे को दे और घटिया - घटिया स्वयं काम में ले । घर में घटिया खाये और दान में बढ़िया दे तो नरक नहीं है । यह रहस्य समझ में आ जाय तो एक मिनट में काम बन जाता है । नौकर को बढ़िया रोटी नहीं दे सके तो उसके नकद रुपये ठहरा दे । सूखा आटा देने का इकरार कर दे , परंतु आप जो रसोई खायें उसमें विषमता न करें । 

दूसरी बात है जो चीज देते हैं भाव से दें । घरपर पाँच आदमी आ गये , मित्र हैं उनको आफत समझा । आफत समझकर सत्कार किया तो कर्तव्यका पालन तो किया । अनाथ , अभ्यागत आ गये , उसका दूसरा कर्तव्य आ गया । उसके फलस्वरूप संसारका पदार्थ , स्वर्ग मिल गया , परंतु परमात्मा की प्राप्ति के मुकाबले में स्वर्ग क्या चीज है । निष्काम भाव से सेवा करे तो अपनी आत्मा का कल्याण हो सकता है । 

कोई लोभी आदमी क्या यह भी पूछता है कि अमुक रोजगार लगाया तो कितने दिनतक रुपये मिलते रहेंगे ? यदि सदा मिलते रहें तो बड़ी प्रसन्नता होती है । अतिथि को घरवाले कहें कि ये सदा ही भोजन करते रहें तो बड़ी प्रसन्नताकी बात है । यदि वे जाने लगें तो कहे कि मेरी कोई त्रुटि तो नहीं रह गयी ? श्रद्धा - प्रेम में कमी तो नहीं रही ? वास्तवमें सच्चा महात्मा हो , उसमें हमारी श्रद्धा , विश्वास हो तो वे सदा हमारे साथ रहेंगे और लाभ मालूम पड़ेगा । मन मारकर भोजन कराये , कष्ट ज्यादा हो , खर्च भारी लगे तो परिश्रम तो उतना ही किया , परंतु फल में कमी हो जाती है । हम सेवा करते हैं , सुविधा पहुँचाते हैं , उसमें हमें प्रसन्नता होनी चाहिये । यह समझे कि इनकी सेवा भगवान की सेवा है तो उसको भगवान के मिलने में समय नहीं लगता । 

इससे नीचा दर्जा यह है कि यह भगवान की भक्ति करता है , हमें इसकी मदद करनी चाहिये । यह भाव दूसरे नम्बरपर है । तीसरा है झंझट समझकर उसको लाभ पहुँचायें तो न करनेवाले की अपेक्षा लाख दर्जे अच्छा है । सब भगवान के रूप हैं , उनकी सेवा करने से परमात्मा की प्राप्ति इसी जन्म में हो जाती है । एक क्षण में प्राप्ति हो जाती है । उनको नारायण समझकर प्रसन्नता के साथ सेवा करनेसे बहुत थोड़े समय में परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है । यह भेद अपने लिये ही खतरे की चीज है । यहाँ खतरा क्या है ? एक आदमी का एक जन्म में ही कल्याण हो जाय और दूसरे का सौ जन्म में यह इतना भेद हो जाता है । भाव ही प्रधान है । सब भगवान् हैं , यह भाव करे । यह नहीं कर सके तो सबमें भगवान् हैं यह भाव करे । शरीर में मेरी आत्मा भगवान् हैं । शरीर की सेवा उनकी सेवा स्वतः ही हो गयी । सबके शरीरों में भगवान् विराजमान हैं । 

भगवान कहते हैं कि विश्वास न करने के कारण मारे जाते हैं । हमें खान मिल गयी । भगवान ने कहा - जो तू चाहेगा वही मिलेगा । हीरा माणिक समझेगा तो हीरा माणिक मिलेगा और पारस  परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है , उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मो द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है । इसका यह रहस्य है कि संसार मेरा स्वरूप है , इसकी पूजा मेरी पूजा है । संसार को परमात्मा का स्वरूप या परमात्मा की संतान या परमात्मा इसमें व्याप्त हैं , ऐसा विश्वास करे । गीता भगवान के वचन हैं , नहीं भी समझ में आये तो श्रद्धा से ही मान ले  ।