आत्म चिंतन करें , होगी परमात्मा की प्राप्ति - onlinegurugyan

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     आत्म चिंतन से परमात्मा की प्राप्ति

मनुष्य यदि भोगों से विरक्त होकर परमात्मा के चिन्तन में लग जाता है , तब वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है । थोड़ा - सा विचार करने पर प्रत्येक बुद्धिमान् मनुष्य की समझ में यह बात आ जाती है कि इस प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले जगत के रचयिता और परमाधार कोई एक परमेश्वर अवश्य हैं । इस प्रकार जिन में यह सम्पूर्ण जगत् स्थित हुआ प्रतीत होता है , उन परम विशुद्ध प्रकाशमय धामस्वरूप परब्रह्म परमात्मा को समस्त भोगों की कामना का त्याग करके निरन्तर उनका ध्यान करने वाला साधक जान लेता है । 

यह बात निश्चित है कि जो मनुष्य उन परम पुरुष परमात्मा की उपासना करते हैं और एकमात्र उन्हीं को चाहते हैं , वे सर्वथा पूर्ण निष्काम होकर रहते हैं । किसी प्रकार के भोगों में उनका मन नहीं अटकता , अत: वे इस रजोवीर्यमय शरीर को लाँघ जाते हैं । उनका पुनर्जन्म नहीं होता । इसलिये उन्हें बुद्धिमान् कहा गया है , क्योंकि जो सार वस्तु के लिये असार को त्याग दे , वही बुद्धिमान् है ।

जन्म - मृत्यु से रहित 

जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्मा को जान लेता है , वह ब्रह्म ही हो जाता है । सब प्रकार के शोक और चिन्ताओं से सर्वथा पार हो जाता है , हृदय में स्थित सब प्रकार के संशय , विपर्यय , देहाभिमान , विषयासक्ति आदि ग्रन्थियों से सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है । जन्म - मृत्यु से रहित हो जाता है ।

अपने अंदर ही है परमात्मा का वास

आज अधिकांश मनुष्य अशान्त हैं , चिन्ताओं से ग्रस्त हैं , जिस शान्ति और परमात्मा को बाहर जगह - जगह ढूँढते हैं , वे परमदेव परब्रह्म परमात्मा अपने ही भीतर हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हैं । इनको जानने के लिये कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है । अपने ही भीतर स्थित परमात्मा को जानने की चेष्टा करनी चाहिये, क्योंकि जानने योग्य इनसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं । इन एक को जानने से ही सबका ज्ञान हो जाता है , ये ही सबके कारण और परमाधार हैं ।

जिस प्रकार ऊपर से सूखी हुई नदी के भीतरी स्रोतों में जल , दही में घी , तिलों में तेल तथा अरणियों में अग्नि छिपी रहती है , उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदयरूप गुफा में छिपे हैं । जिस प्रकार अपने - अपने स्थान में छिपे हुए तेल आदि उनके लिये बताये हुए उपायों से उपलब्ध किये जा सकते हैं , उसी प्रकार जो कोई साधक विषयोंसे विरक्त होकर सदाचार , सत्यभाषण तथा संयमरूप तपस्या के द्वारा साधन करता हुआ उनका निरन्तर ध्यान करता रहता है , उनके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किये जा सकते हैं । मनुष्यरूपी शरीर में जीवात्मा और परमात्मा दोनों मौजूद हैं , लेकिन अनेक जन्मों के कर्मो के संस्कारस्वरूप हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गये हैं । 

ध्यान - योग के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति

जैसे बहुत कीमती रत्न मिट्टी में सन जाने पर अपने वास्तविक रूप से विमुख हो जाता है और उसकी धूल - मिट्टी हटाने पर उसमें चमक आ जाती है , उसी प्रकार ध्यान - योग के द्वारा हम अपने वास्तविक रूपको पहचान पाते हैं और जैसे ही हम भोग - विलास , कामनाओं , आसक्ति आदि को छोड़कर ईश्वर की तरफ देखते हैं अर्थात् जीवात्मा परमात्मा की तरफ मुँह कर लेता है , तब तत्काल ही वह शोक रहित हो जाता है । मनुष्य धन का संग्रह करते करते पहले की अपेक्षा ऊँची स्थिति को प्राप्त होकर भी कभी तृप्त नहीं होते , वे और अधिक की आशा लिये ही मर जाते हैं , इसलिये विद्वान् पुरुष सदा सन्तुष्ट रहते हैं । 

संग्रहका अन्त है विनाश । ऊँचे चढ़नेका अन्त है नीचे गिरना । संयोग का अन्त है वियोग और जीवन का अन्त है मरण ।

तृष्णा का कभी अन्त नहीं होता । संतोष ही परम सुख है , अत : विवेकी पुरुष इस लोक में संतोष को ही परम धन मानते हैं ।

आयु लगातार बीत रही है , वह कभी विश्राम नहीं लेती । जब अपना शरीर ही अनित्य है तो दूसरी किस वस्तु को नित्य समझा जाय । जो भी मनुष्य  सभी प्राणियों के अंतरमन से परे परमात्मा को जानकर परमात्मा का चिन्तन करते हैं , वे संसार - यात्रा समाप्त होने पर परमपद का साक्षात्कार करते हुए शोक के पार हो जाते हैं । अतः हमें आजसे ही आत्मचिन्तन शुरू कर देना चाहिये ताकि यही जन्म हमारा अन्तिम जन्म बन सके और हम संसार के आवागमन से छूट सकें ।